वेदांत के विख्यात और बेहद प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद जी की आज 156 वीं जयंती है। स्वामी विवेकानंद जी की जयंती को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 में कोलकाता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। स्वामी जी के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। स्वामी विवेकानंद जी के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाई कोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। स्वामी जी की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। स्वामी जी की माता धार्मिक विचारों की महिला थी। उनका अधिकतर समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में बीतता था। स्वामी जी के माता और पिता बेहद धार्मिक प्रवृत्ति एवं प्रगतिशील व तर्कसंगत व्यक्तित्व के धनी थे। स्वामी जी के माता-पिता की सोच और व्यक्तित्व ने स्वामी जी के जीवन पर बचपन से बेहद गहरा असर डाला।

 

‘रामकृष्ण परमहंस मिशन’

नरेंद्र बचपन से ही बेहद तेज बुद्धि के धनी व शरारती थे। नरेंद्र मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने का कोई मौका नहीं चूकते थे। नरेंद्र के घर का वातावरण धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण उनके मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गए। कभी-कभी तो नरेंद्र उत्सुकता के कारण ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि, माता-पिता के साथ कथावाचक पंडित जी भी चक्कर में पड़ जाते थे। नरेंद्र के दादा श्री दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी के प्रकांड विद्वान थे। नरेंद्र अपने गुरु रामकृष्ण से बेहद प्रभावित थे। स्वामी विवेकानंद ने अपना संपूर्ण जीवन अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के लिए समर्पित कर दिया। अपने गुरु के नाम पर स्वामी विवेकानंद जी ने ‘रामकृष्ण परमहंस मिशन’ की स्थापना की, जो आज भी अपना कार्य लगातार कर रहा है।

 

विश्व धर्म महासभा में भारत की पहचान

सन 1893 में अमेरिका स्थित शिकागो में एक विश्व धर्म महासभा का आयोजन किया गया। इस महासभा में स्वामी विवेकानंद जी ने भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया। यूरोप और अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारत वासियों को बहुत ही हीन दृष्टि से देखते थे, इसी वजह से वहां के लोगों ने यह प्रयास किया कि स्वामी जी को धर्म सभा में बोलने का मौका ना मिल सके। एक अमेरिकी प्रोफ़ेसर के प्रयास से स्वामी जी को बोलने के लिए थोड़ा समय दिया गया। स्वामी जी ने इस धर्मसभा में अपने भाषण की शुरुआत “मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों” के साथ की। स्वामी जी के संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने ही सबका दिल जीत लिया। धर्मसभा में स्वामी जी के विचार सुनकर वहां मौजूद सभी विद्वान आश्चर्यचकित रह गए। इसके बाद तो अमेरिका में स्वामी जी का भव्य तरीके से स्वागत किया गया। स्वामी जी ने अमेरिका में 3 साल बिताए और वहां भी परमहंस मिशन की कई शाखाएं संचालित की। स्वामी विवेकानंद जी ने भारत को विश्व के सम्मुख एक नई पहचान दिलाई।

 

युवाओं के मार्गदर्शक

स्वामी विवेकानंद जी युवाओं के लिए उनके मार्गदर्शक, प्रेरणा स्रोत और आदर्श हैं। युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद जी ने कई अनमोल विचार दिए हैं। स्वामी जी का एक कथन युवाओं के लिए बहुत ही प्रेरणादायी है। स्वामी जी ने कहा था कि “‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” स्वामी जी के बारे में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि, “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए, उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।“ स्वामी जी ने बच्चों की शिक्षा पर काफी बल दिया। उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा ना देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए। स्वामी जी ने अपने जीवन के अंतिम दिन भी अपने ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रातः दो-तीन घंटे ध्यान किया। अपनी ध्यानावस्था में ही 4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद जी ने महासमाधि ले ली। स्वामी जी के कई विचार युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं और उनका मार्गदर्शक के रूप में मार्गदर्शन भी करते हैं। युवाओं को जरूरत है तो सिर्फ इतनी कि, स्वामी जी के विचारों को अपने जीवन में उतारें और उनके द्वारा दिखाए हुए मार्ग पर चलें। स्वामी विवेकानंद जी अपने 39 वर्ष के संक्षिप्त जीवन काल में जो काम कर गए, वह आने वाली अनेक शताब्दियों तक, पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।